(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Aadiparv (Mahabharat) - आदिपर्व (महाभारत)


॥ श्रीः ॥
1.190. अध्यायः 190
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Topics
गन्धर्वेण वसिष्ठमाहात्म्यकथनपूर्वकं पाण्डवानां पुरोहितसंग्रहणोपदेशः॥ 1 ॥
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच। 1-190-0x(1082)(8514)
स गन्धर्ववचः श्रुत्वा तत्तदा भरतर्षभ।
अर्जुनः परया भक्त्या पूर्णचन्द्र इवाबभौ॥ 1-190-1(8515)
उवाच च महेष्वासो गन्धर्वं कुरुसत्तमः।
जातकौतूहलोऽतीव वसिष्ठस्य तपोबलात्॥ 1-190-2(8516)
वसिष्ठ इति तस्यैतदृषेर्नाम त्वयेरितम्।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं यथावत्तद्वदस्व मे॥ 1-190-3(8517)
य एष गन्धर्वपते पूर्वेषां नः पुरोहितः।
आसीदेतन्ममाचक्ष्व क एष भगवानृषिः॥ 1-190-4(8518)
गन्धर्व उवाच। 1-190-5x(1083)
ब्रह्मणो मानसः पुत्रो वसिष्ठोऽरुन्धतीपतिः।
तपसा निर्जितौ शश्वदजेयावमरैरपि॥ 1-190-5(8519)
कामक्रोधावुभौ यस्य चरणौ समुवाहतुः।
इन्द्रियाणां वशकरो वशिष्ठ इति चोच्यते॥ 1-190-6(8520)
`यथा कामश्च क्रोधश्च निर्जितावजितौ नरैः।
जितारयो जिता लोकाः पन्थानश्च जिता दिशः॥' 1-190-7(8521)
यस्तु नोच्छेदनं चक्रे कुशिकानामुदारधीः।
विश्वामित्रापराधेन धारयन्मन्युमुत्तमम्॥ 1-190-8(8522)
पुत्रव्यसनसंतप्तः शक्तिमानप्यशक्तवत्।
विश्वामित्रविनाशाय न चक्रे कर्म दारुणम्॥ 1-190-9(8523)
मृतांश्च पुनराहर्तुं शक्तः पुत्रान्यमक्षयात्।
कृतान्तं नातिचक्राम वेलामिव महोदधिः॥ 1-190-10(8524)
यं प्राप्य विजितात्मानं महात्मानं नराधिपाः।
इक्ष्वाकवो महीपाला लेभिरे पृथिवीमिमाम्॥ 1-190-11(8525)
पुरोहितमिमं प्राप्य वसिष्ठमृषिसत्तमम्।
ईजिरे क्रतुभिश्चैव नृपास्ते कुरुनन्दन॥ 1-190-12(8526)
स हि तान्याजयामास सर्वान्नृपतिसत्तमान्।
ब्रह्मर्षिः पाण्डवश्रेष्ठ बृहस्पतिरिवामरान्॥ 1-190-13(8527)
तस्माद्धर्मप्रधानात्मा वेदधर्मविदीप्सितः।
ब्राह्मणो गुणवान्कश्चित्पुरोधाः प्रतिदृश्यताम्॥ 1-190-14(8528)
क्षत्रियेणाभिजातेन पृथिवीं जेतुमिच्छता।
पूर्वं पुरोहितः कार्यः पार्थ राज्याभिवृद्धये॥ 1-190-15(8529)
महीं जिगीषता राज्ञा ब्रह्म कार्यं पुरःस्कृतम्।
तस्मात्पुरोहितः कश्चिद्गुणवान्विजितेन्द्रियः।
विद्वान्भवतु वो विप्रो धर्मकामार्थतत्त्ववित्॥ ॥ 1-190-16(8530)

इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वमि चैत्ररथपर्वणि नवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ 190 ॥

Mahabharata - Adi Parva - Chapter Footnotes
1-190-2 तपोबलात् तपोबलं श्रुत्वा॥ 1-190-7 जितारयः जिता अस्य इति च्छेदः॥ 1-190-8 अपराधेन पुत्रशतवधरूपेण॥ नवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ 190 ॥


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